बचपन से लेकर अब तक क्या आपने कभी सोचा कि आपकी गुल्लक का आकार पिग की ही तरह ही क्यों होता है? इसे पिगी बैंक ही क्यों? जिराफ बैंक क्यों नहीं? लायन बैंक क्यों नहीं?

बचपन में जब भी दादी-नानी ने पैसे दिए होंगे, आपका भी मन उसे गुल्लक (पिगी बैंक) में रखने के लिए मचला होगा. जाने कितनी बार इसकी खातिर सिक्कों के लिए आपने पूरे घर को सिर पर उठा लिया होगा? आप बड़े हो गए और उस गुल्लक की जगह अब बैंक ने ले ली है, लेकिन बचपन से लेकर अब तक क्या आपने कभी सोचा कि आपकी गुल्लक का आकार पिग की ही तरह ही क्यों होता है? पिगी बैंक ही क्यों? जिराफ बैंक क्यों नहीं? लायन बैंक क्यों नहीं? एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पिग्गी बैंक या गुल्लक में पैसे डालने का चलन ही बचत का पहला नियम है. 
गुल्लक या पिगी बैंक का इतिहास;
पंद्रहवीं सदी में धातु बहुत महँगी होती थी इसी कारण घर के बर्तन बनाने में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता था. उस समय घरेलू बर्तनों के निर्माण में धातुओं की जगह “piggy” नामक एक ‘किफायती मिट्टी’ का प्रयोग करते थे. स्त्रियाँ अपनी बचत को पिगी मिटटी के जार में रखतीं थीं इस कारण उस समय उस जार को पिगी बैंक या गुल्लक के नाम से जाना जाने लगा था.
19वीं सदी में जब अंग्रेजी कुम्हारों को “piggy बैंक” या गुल्लक बनाने के ऑर्डर प्राप्त हुए तो उन्होंने पिग की शक्ल जैसी गुल्लकों का निर्माण करना शुरू किया (क्योंकि अंग्रेजी में सुअर को PIG कहा जाता है). बस तब से गुल्लक को सुअर के आकार में बनाना शुरू हो गया था.
गुल्लक को “पिग” के रूप में दिखाने का एक और व्यावहारिक कारण;
जैसा कि हम सभी लोग जानते हैं कि घोड़ा, हाथी, गाय, बकरी भेंस और कुत्ता चारा तथा खाद्य पदार्थ इत्यादि खाते हैं जिसकी लागत इन्हें पालने वालों को सहन करनी पड़ती है उसके बाद ही ये जानवर किसान के लिए कुछ धन अर्जन का श्रोत बनते हैं.
लेकिन क्या आप यह बात जानते है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में एक ऐसा जानवर पाला जाता है जिसको रखने में कोई लागत नहीं आती है.
ग्रामीण इलाकों में रहने वाला सुअर इसके मालिकों द्वारा खुला छोड़ दिया जाता है जो कि उस इलाके में घास फूंस, मल और शादी जैसे मौकों पर फेंका गया भोजन इत्यादि की मदद से अपना पेट भर लेता है.
इसका मतलब यह हुआ कि सुअर के मालिकों को सुअर रखने में किसी भी लागत को सहन नहीं करना पड़ता है यानि कि 100% बचत. जब ये सुअर बड़े हो जाते हैं तो महंगे दामों पर बाजार में बिक जाते हैं क्योंकि सुअर के शरीर में बहुत फैट होता है जिसकी बाजार में बहुत मांग होती है.
इस प्रकार सुअर रखने वाला व्यक्ति बिना किसी लागत के सुअर पालकर बड़ी मात्रा में बचत कर लेता है. इसलिए भारत में सुअर को गुल्लक के रूप में दिखाया जाना बिलकुल सही प्रतीत होता है.
हालाँकि भारत में लागू होने वाला यह कांसेप्ट विकसित देशों में लागू नहीं होता है और सुअरों के मालिकों को इन्हें पालने के लिए बड़ी मात्रा में खर्च करना पड़ता है. उम्मीद है कि इस लेख को पढ़ने के बाद आप समझ गए होंगे कि गुल्लक को सुअर के चित्र से क्यों दिखाते हैं और भारत के सन्दर्भ में पिगी बैंक को सुअर के रूप में दिखाया जाना कितना सटीक है.
